झारखण्ड के जनजातीय समाज में िचत्रकला एवं लोकगीतों का महत

लेखक

  • िमनाक्षी कमारी रिव ##default.groups.name.author##

सार

भारतीय परम्परा के अनुसार कला उन सारी िक्रयाओं को कहते हैं िजनमें कौशल अपेिक्षत हो। यूरोपीय शािस्त्रयों ने भी कला में कौशल को महत्वपूणर् माना है। कला एक प्रकार का कृ ित्रम िनमार्ण है िजसमें शारीिरक और मानिसक कौशलों का प्रयोग होता है। कला मानव संस्कृ ित की उपज हैं इसका उदय मानव की सौन्दयर् भावना का पिरचायक है। 
सीधे शब्दों में कहें तो आम तौर पर मानव द्वारा उसकी मिस्तष्क में चल रही हजारों प्रकार की कल्पनाओं को अन्य सभी भाई बन्धुओं के सामने िदखने की िक्रया को ही कला या आटर् कहते है। कला उस िक्षितज की भांित है िजसका कोई छोर नहीं इतनी िवशाल इतनी िवस्तृत अनेक िवधाओं को अपने में समेटे तभी तो किव मन कह उठा- सािहत्य संगीत कला िवहीन : साक्षात पशुः पुच्छ िवषणहीन: ।। 

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प्रकाशित

2026-05-04