भारत में जेंडर न्याय और नारीवादी कानूनी सुधारः चुनौतियाँ एवं अवसर

लेखक

  • गुरपिंदर कु मार ##default.groups.name.author##

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नारीवाद,##common.commaListSeparator## कानूनी सुधार##common.commaListSeparator## जेंडर न्याय##common.commaListSeparator## महिला

सार

यह शोध आलेख भारत मेंजेंडर न्याय प्राप्त करनेहेतुनारीवादी कानूनी सुधारों की अनिवार्यआवश्यकता की
पड़ताल करता है। पिछलेकु छ वर्षों मेंकानूनी परिदृश्य मेंउल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, विभिन्न क्षेत्रों मेंजेंडर
असमानताएँअब भी व्यापत हैं, जिसके लिए नारीवादी दृष्टिकोण सेमौजूदा कानूनों और नीतियों के
आलोचनात्मक परीक्षण की आवश्यकता है। सारांश मेंभारतीय संदर्भमेंजेंडर न्याय हेतुनारीवादी कानूनी
सुधारों पर चर्चाको आकार देनेवालेप्रमुख विषयों, पद्धतियों और निष्कर्षों की रूपरेखा दी गई है। शोध आलेख
भारत मेंजेंडर असमानताओ ंको बढ़ावा देनेवालेऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों को संदर्भित
करके शुरू होता है। यह महिला, ट्रांसजेंडर और अन्य हाशियागत जेंडर पहचानों के समक्ष बहुमुखी चुनौतियों
का समाधान करनेमेंमौजूदा कानूनी ढाँचों की सीमाओ ंपर प्रकाश डालता है। विवाह, उत्तराधिकार, घरेलू
हिंसा, कार्यस्थल पर भेदभाव और प्रजनन अधिकारों सेसंबंधित मौजूदा कानूनों का आलोचनात्मक विश्लेषण
उन कमियों और पूर्वाग्रहों को उजागर करता हैजो जेंडर आधारित भेदभाव को कायम रखतेहैं। यह शोध
आलेख इन कानूनी ढाँचों की व्यापक समीक्षा के लिए तर्क देता है, ऐसेसंशोधनों की वकालत करता हैजो
समकालीन नारीवादी दृष्टिकोणों को दर्शातेहैंऔर मौलिक समानता को बढ़ावा देतेहैं।

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