भारतीय दशर्न में िनिहत संत एवं भक्त रूपी शब्दावली का वतर्मान पिरप्रेक में प्रासंिगकता

लेखक

  • डॉ. सुनील कुमार जलथुिरया ##default.groups.name.author##

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श्रद्धा##common.commaListSeparator## मानवीय आत्मचेतना##common.commaListSeparator## सत्व##common.commaListSeparator## सृिष्ट

सार

भारतीय दशर्न और अध्यात्म में संत और भक्त की अवधारणा अत्यंत महत्त्वपूणर्है। भिक्त 
आंदोलन की पूवर्पीिठका में आध्याित्मक जीवन की अस्त-व्यस्त िस्थित को सुधारने के िलए संतों ने 
महत्त्वपूणर्भूिमका िनभाई। मानव की मानवीय आत्मचेतना की परानुरिक्त का ऐसा प्रकाशन भिक्त
तत्व है, जो सम्पूणर् िवश्व के सृजन के कारण ही परमात्मा तत्त्व के प्रित रागात्मक संबंध के िविभन्न 
रूपों द्वारा अिभव्यंिजत िकया जाता है। इस भिक्त का उद् गम मानव की उस शुद्ध बुिद्ध सत्व की अंतः 
प्रेरणा से हुआ है, िजसका अनंत प्रचार-प्रसार सृिष्ट के कण-कण में समािहत है और चहुँ ओर देखा जा 
सकता है । श्रद्धा और प्रेम का यह योग हमें हमारे इष्ट प्रभु के आनन्द सागर में डूबो देने की क्षमता 
रखता है। इसी भिक्त तत्त्व के मूल में हमें भावों का अथाह समंदर भी िमलता है, िजसमें गोता लगाकर 
ही मानव मुिक्त  की श्रेणी में पहुँचकर भिक्त रस में लींन हो जाता है। इस भिक्त में गोता लगाने वाले 
मुख्य रूप से भक्त एवं संत की श्रेणी शािमल जीव होते हैं। इस लेख में भक्तों  एवं संतों पर िवस्तृत 
चचार् की गई है ।

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प्रकाशित

2026-05-04